Shayari on politics | वो बताता रहा नस्लों का मसीहा खुद को

 


बाग में भौरों के हौसले उडा़न पर थे

पूरी बाग के फूल अपने अवसान पर थे, 

इक इक नशों से रस निचोड़ने में कोई कसर बाकी न छोड़ी

कम अक्ल मासूम फूल लुटकर भी मैदान पर थे!! 

वो बताता रहा नस्लों का मसीहा खुद को

दर्द सहकर भी फूल नस्लों के गुमान पर थे, 

फूलों के गुमराह होने में हवाओं का भी उतना ही कसूर था

जहर घोलती रही फिजाओं में फूल अमृत होने के गुमान पर थे.... 

फूल समझते रहे मधुमक्खियों को नहीं तो क्या भौरों को चुन लूं

डंक सहते रहे फिर भी फूल मधुमक्खियों के मकान पर थे.


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