अजीज़ है मुझको वो आइना,
जो मेरी अस्ल बयां करता है।
अबद से खड़ा है, जाने कितनी अब्सार लिए हुए,
खड़ा है वो लाखो तसव्वुफ़ संजोए
जाने क्या क्या देखा है उसने
खुद को देखा, मुगलों, अंग्रेजों
जाने कितने हिन्दू, मुस्लिम ,सिक्ख ,ईसाई देखा होगा उसने
खाक में मिलती दुनिया, नया पनपता जीवन
लाखों का उगता डूबता सूरज भी देखा है उसने,
पर कभी कोई सिकवा न गिला किया किसी से
शायद कृष्ण के काल में भी वो रहा होगा
गीता को भी उसने सुना होगा
तभी तो वो जानता है,
ये सभी जीवन चक्र के हिस्से हैं,
जो हमारे लिए आज हैं ,
वो कल के किस्से हैं,
समझाता है हर रोज वो हमको,
अपना फर्ज बखूबी अता करता है,
अजीज है मुझको............।।।।।।

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