गमगुस्सार न था कोई,
गमदीदा बहुत था मैं
गमख्व़ार जब तुमने अश्फाक दिया,
अहजा़न छट गए तुम्हारे अस्बाब से,
मेंरे अंजुमन में बहार फिर से छायी
गजीदा था तेरा ही दिल पर
तूने ही जख्म दिया फिर तूने ही दी दवाई।।
आसान न था मुझे यूंही छोड़ के आगे बढ़ जाना,
इख्लास था मेरे इख्लास में इस हद्द तक,
कि छोड़ कर मुझे तू इक कदम भी न बढ़ पायी।
आवाज़ह बहुत हुई थी मैं भी आसुफ्ता था बहुत।।
ऐ अश्किया़ मेरी आसिम़ थी तू मुआफ़ न करता ।
आसरा थी मेरी जो इतनी आहिस्ता से चली आई।।
गमदीदा बहुत था मैं
गमख्व़ार जब तुमने अश्फाक दिया,
अहजा़न छट गए तुम्हारे अस्बाब से,
मेंरे अंजुमन में बहार फिर से छायी
गजीदा था तेरा ही दिल पर
तूने ही जख्म दिया फिर तूने ही दी दवाई।।
आसान न था मुझे यूंही छोड़ के आगे बढ़ जाना,
इख्लास था मेरे इख्लास में इस हद्द तक,
कि छोड़ कर मुझे तू इक कदम भी न बढ़ पायी।
आवाज़ह बहुत हुई थी मैं भी आसुफ्ता था बहुत।।
ऐ अश्किया़ मेरी आसिम़ थी तू मुआफ़ न करता ।
आसरा थी मेरी जो इतनी आहिस्ता से चली आई।।

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