SAJISH
वो जो अपनी जुल्फें लहरा रही है न
शाजि़स कर रही है,
मुझे बार बार देख कर जो शरमा रही है न
शाज़िस कर रही है।।
मुझे बर्बाद करने की मानो कसम खा रखी हो,
बार बार देखकर मुझे जो मुस्कुरा रही है न,
शाजिस कर रही है।।
हम भी समझते हैं ये अप्सराएँ हैं, नादान नहीं हूँ,
जो अपनी अदाओं से रिझा रही है न ,
शाजिस कर रही है।।
कोई मोम के पुतले थोड़ी हैं हम, जो पिघल जायेंगे,
जो ये लटें बिखरा रही है न ,
शाजिस कर रही है।।
घाट घाट का पानी पी कर हम यहाँ तक पहुँचे है,
सब जानते हैं जो बार बार बुला रही है न,
शाजिस कर रही है।।
क्या सोचती थी आंसू दिखाकर मुझसे बच कर यूँ ही चली जायेगी
जो बार बार आंसू छलका रही है न ,
शाजिस कर रही है।
हम ने तो हां नहीं कहा था तुम ही परेशां थे,
अब आ ही गया हूँ तो खाली हाथ थोड़ी जाउंगा,
अब रो रो के गिड़गिड़ा रही है न ,
शाजिस कर रही है।।
कैसे जाने दूं तुम्हे ऐसे ही बदनाम तो कर ही दिया है,
क्यों न बदनाम होकर कह दूँ कि ,
शाजिस कर रही है।।

2 टिप्पणियां:
कवि जगत को तुम जैसो की जरूरत है भाई।
thanks
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