मेरे मरहूम दिल पर बार बार चोट लगी है,
हर बार सम्भल जाता हूँ,
फिर से उन्हीं रास्तों पर चल पड़ता हूँ,
सीख ले कर पुराने जख्मों से आगे बढ़ जाता हूँ,
वो इंसान ही क्या जिसे कभी दर्द न मिले,
हर दर्द से मैं तो एक नया तजुर्बा पाता हूँ,
सुख ,दुःख जीवन के हिस्से है,
कभी धूप कभी छांव यही सच्चे किस्से हैं,
ये न आये तो जिंदगी को मैं अधूरा पाता हूँ।।
बगैर इनके जीवन में कुछ कहाँ है,
इन्हीं से तो मैं हर बार एक नयी उम्मीद पाता हूँ,
सम्भलना ,गिरना ,चलना और बढ़ते रहना,
इन्सान हूँ न इसलिए इन्हें संजीदगी से निभाता हूँ,
कुछ पाना खोना या चाहत रखना,
इन्सान की आवश्यक कमजोरी है,
कर्म ही है जिससे मैं सुकून पाता हूँ,
कर्म से परे कुछ नही,कर्म के बगैर कुछ भी नहीं,
लोग कुछ भी कहें किस्मत किस्मत किस्मत,
कर्म अच्छा हो तभी मैं किस्मत को साथ पाता हूँ।।
कर्म आवश्यक और चक्रीय आधार है,
पहले वे आज मैं कल कोई और को करना पड़ेगा,
लोग कुछ भी करें या कहें उनका क्या कहना,
पर गर मैं भी कर्म पथ छोड़ दूं तो,
सारी सृष्टि को थमा हुआ पाता हूँ।।
मैं जानता हूँ आज हूँ कल नहीं रहूँगा,
तभी तो हर वक़्त जिन्दगी को अपने पास पाता हूँ,
निराशा समाधान नहीं किसी विफलता का,
आशावादी हूँ तभी तो जिन्दा रह जाता हूँ,
चाहत ,सुख, दुःख ,इच्छा ये सब भौतिकताएं है,
प्रेम में हूँ तभी तो इनसे परे हो पाता हूँ,
प्रेम जीव की अनिवार्य आवश्यकता है,
बगैर प्रेम के मैं इन्सान को इन्सान नहीं पाता हूँ।।
प्रेम क्या है अक्सर लोग पूछ लेते हैं,
प्रेम को मैं स्वयं परिभाषित नहीं कर पाता हूँ,
इतना जानता हूँ प्रेम में इन्सान इन्सान होता है,
हर सुख -दुःख इच्छा आशा से परे होता है,
प्रेम उस जुगुनू की भांति है जो न चाहे,
तो भी प्रकाश ही फैलाता है,
प्रेम में कभी हार या जीत नहीं हो सकती है,
प्रेम में तो इन्सान स्वयं ही प्रेमी और स्वयं ही द्वन्दी होता है,
प्रेम तो हर बंधन और आशाओं इच्छाओं से परे होता है।।
लोग पूछते हैं तुम इतने खामोश क्यों रहते हो आजकल,
उन्हें क्या पता प्रेम में इन्सान स्वयं की सुध खो देता है,
मैं कितना भी उन्हें समझाऊँ पर समझा नहीँ पाता हूँ,
दुखी नहीं हूँ चिन्तन में हूँ कैसे बताऊँ उन सबों को,
मैं जिधर देखता हूँ बस प्रेम ही प्रेम को पाता हूँ,
प्रेम कोई विषय नहीं है वाद विवाद का,
प्रेम तो स्वच्छन्द नजरिया है, जिसे सिर्फ मैं ही देख पाता हूँ।।
लोग कहते हैं मेरा प्रेम अधूरा रह गया,
पर उन्हें क्या पता प्रेम अधूरा या पूरा हो ही नहीं सकता,
नासमझों कि बात को सिर्फ चाहत में ही समेट पाता हूँ,
प्रेम में किसी के होने या न होने का सवाल ही नहीं,
आत्मा से जुड़ जाये तो फिर प्रेम में कोई बवाल ही नहीं,
मैं कौन हूँ क्या हूँ किसी को नहीं पता,
ढूंढता हूँ जब मैं खुद ही नहीं समझ पाता हूँ,
जो भी हूँ जैसा भी हूँ प्रेम का निशान हूँ,
लोग कुछ भी कहें मै कल भी इन्सान था आज भी इन्सान हूँ।।
आप भी इन्सान होने का दावा करेंगे मैं जानता हूँ,
तो चलिए आपको इन्सान होने का पाठ पढा़ता हूँ,
ईर्ष्या, क्रोध, द्वेष, लोभ, मोह, आशा, निराशा,
चाहत इन्सान की द्वितीयक आवश्यकता है।
प्रेम एक मात्र इन्सान होने की प्राथमिकता है,
अनावश्यक इच्छाएं इन्सान को इन्सानियत से दूर करती हैं,
परे हूँ इन सब से तभी तो इन्सान कहलाता हूँ,
दया, क्षमा, प्रेम हर किसी में कहाँ पाता हूँ,
तभी तो हर किसी को इन्सान नहीं कह पाता हूँ,
मेरे वज़ूद पर खुद मुझे शक है पर पता है,
परे हूँ सारे बन्धनों से तभी तो सर्वेश कहलाता हूँ।।
हर बार सम्भल जाता हूँ,
फिर से उन्हीं रास्तों पर चल पड़ता हूँ,
सीख ले कर पुराने जख्मों से आगे बढ़ जाता हूँ,
वो इंसान ही क्या जिसे कभी दर्द न मिले,
हर दर्द से मैं तो एक नया तजुर्बा पाता हूँ,
सुख ,दुःख जीवन के हिस्से है,
कभी धूप कभी छांव यही सच्चे किस्से हैं,
ये न आये तो जिंदगी को मैं अधूरा पाता हूँ।।
बगैर इनके जीवन में कुछ कहाँ है,
इन्हीं से तो मैं हर बार एक नयी उम्मीद पाता हूँ,
सम्भलना ,गिरना ,चलना और बढ़ते रहना,
इन्सान हूँ न इसलिए इन्हें संजीदगी से निभाता हूँ,
कुछ पाना खोना या चाहत रखना,
इन्सान की आवश्यक कमजोरी है,
कर्म ही है जिससे मैं सुकून पाता हूँ,
कर्म से परे कुछ नही,कर्म के बगैर कुछ भी नहीं,
लोग कुछ भी कहें किस्मत किस्मत किस्मत,
कर्म अच्छा हो तभी मैं किस्मत को साथ पाता हूँ।।
कर्म आवश्यक और चक्रीय आधार है,
पहले वे आज मैं कल कोई और को करना पड़ेगा,
लोग कुछ भी करें या कहें उनका क्या कहना,
पर गर मैं भी कर्म पथ छोड़ दूं तो,
सारी सृष्टि को थमा हुआ पाता हूँ।।
मैं जानता हूँ आज हूँ कल नहीं रहूँगा,
तभी तो हर वक़्त जिन्दगी को अपने पास पाता हूँ,
निराशा समाधान नहीं किसी विफलता का,
आशावादी हूँ तभी तो जिन्दा रह जाता हूँ,
चाहत ,सुख, दुःख ,इच्छा ये सब भौतिकताएं है,
प्रेम में हूँ तभी तो इनसे परे हो पाता हूँ,
प्रेम जीव की अनिवार्य आवश्यकता है,
बगैर प्रेम के मैं इन्सान को इन्सान नहीं पाता हूँ।।
प्रेम क्या है अक्सर लोग पूछ लेते हैं,
प्रेम को मैं स्वयं परिभाषित नहीं कर पाता हूँ,
इतना जानता हूँ प्रेम में इन्सान इन्सान होता है,
हर सुख -दुःख इच्छा आशा से परे होता है,
प्रेम उस जुगुनू की भांति है जो न चाहे,
तो भी प्रकाश ही फैलाता है,
प्रेम में कभी हार या जीत नहीं हो सकती है,
प्रेम में तो इन्सान स्वयं ही प्रेमी और स्वयं ही द्वन्दी होता है,
प्रेम तो हर बंधन और आशाओं इच्छाओं से परे होता है।।
लोग पूछते हैं तुम इतने खामोश क्यों रहते हो आजकल,
उन्हें क्या पता प्रेम में इन्सान स्वयं की सुध खो देता है,
मैं कितना भी उन्हें समझाऊँ पर समझा नहीँ पाता हूँ,
दुखी नहीं हूँ चिन्तन में हूँ कैसे बताऊँ उन सबों को,
मैं जिधर देखता हूँ बस प्रेम ही प्रेम को पाता हूँ,
प्रेम कोई विषय नहीं है वाद विवाद का,
प्रेम तो स्वच्छन्द नजरिया है, जिसे सिर्फ मैं ही देख पाता हूँ।।
लोग कहते हैं मेरा प्रेम अधूरा रह गया,
पर उन्हें क्या पता प्रेम अधूरा या पूरा हो ही नहीं सकता,
नासमझों कि बात को सिर्फ चाहत में ही समेट पाता हूँ,
प्रेम में किसी के होने या न होने का सवाल ही नहीं,
आत्मा से जुड़ जाये तो फिर प्रेम में कोई बवाल ही नहीं,
मैं कौन हूँ क्या हूँ किसी को नहीं पता,
ढूंढता हूँ जब मैं खुद ही नहीं समझ पाता हूँ,
जो भी हूँ जैसा भी हूँ प्रेम का निशान हूँ,
लोग कुछ भी कहें मै कल भी इन्सान था आज भी इन्सान हूँ।।
आप भी इन्सान होने का दावा करेंगे मैं जानता हूँ,
तो चलिए आपको इन्सान होने का पाठ पढा़ता हूँ,
ईर्ष्या, क्रोध, द्वेष, लोभ, मोह, आशा, निराशा,
चाहत इन्सान की द्वितीयक आवश्यकता है।
प्रेम एक मात्र इन्सान होने की प्राथमिकता है,
अनावश्यक इच्छाएं इन्सान को इन्सानियत से दूर करती हैं,
परे हूँ इन सब से तभी तो इन्सान कहलाता हूँ,
दया, क्षमा, प्रेम हर किसी में कहाँ पाता हूँ,
तभी तो हर किसी को इन्सान नहीं कह पाता हूँ,
मेरे वज़ूद पर खुद मुझे शक है पर पता है,
परे हूँ सारे बन्धनों से तभी तो सर्वेश कहलाता हूँ।।

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें