रात की बात थी आज भी रात है
हम तो तन्हाइयों में हैं ऐसे जिए
है फख़त रौशनी फिर भी अंधकार है!
जब भी कोशिश किया कि उजाला लिखूँ
रात की बात थी आज भी रात है!!
याद है क्या तुम्हे वो पुराना समय
वक्त ही वक्त था तुमको भी हर समय
तुम तलख होती थी गर किसी बात पर
मैं हमेशा मना लेता था उस समय
फिर चहल कदमियां होती थी रात की
बात ही बात होती थी बिन बात के..
क्या हुआ जो अचानक यूँ मुंह मोड़ ली
बात छोड़ी जहाँ थी वहीं आज है
जब भी कोशिश किया कि..................... !! 1!!
सुबह आई नहीं जिंदगी में मेरे
राह तकते ही तकते शहर हो गया
सूखकर कंठ जैसे कि कांटा हुए
सांस लेना हवा में ज़हर हो गया
आंखों का था भरम जो नदारद हुआ
खोलकर आंख मैं बेसबर हो गया.
छोड़कर मुझको क्या कोई महफ़िल मिली
ख्वाब का एक घर बेशहर हो गया
राह कटने का अब हमको आसार है
है अकेला सफर थोड़ा दुशवार है..
फिर मिलूँगा दोबारा किसी और जहाँ
बात होगी शुरू जो वहीं आज है...
जब भी......................!! 2!!
1 टिप्पणी:
wah ka baat hai..
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