कायरता है मेरे अंदर
या प्रेम विवशता छायी है
कहना चाहा कह न पाया
वो सामने जब जब आयी है।।
दिन रात उसी की आहें भरता
दिल पल पल उसकी याद में मरता
सुध खोकर बेसुध सा पडा़ हूँ
छोड़ उसे सारी दुनिया,
कितनी हो गयी परायी है
कायरता है...............।।
बेचैनी है दिल में आंखों में कल के सपने हैं
आजाद परिंदे सा उड़ जाते जंजीरों मे जकडे़ हैं
अब तक जिनसे पहचान न हो सकी
हर सपने में वो ही बस अपने हैं।
सोच रहा हूँ अब कह ही दूं तुमको
तुम बिन जीना दुनियाँ में ,
अब लगती एक बुराई है
कायरता है.......।।
झंझावातों तूफानों को कब कब कितना झेलें हैं,
हुआ नहीं एहसास धरा पर कितने हम अकेले हैं,
मायूसी का ऐसा मंजर, पहले कभी न छाया था,
दर्द गमों को हम क्या जाने न रिश्ते कभी निभाया था
आज मगर अन्धेरों में भी उसकी सूरत दिखती है
कौन कहेगा मैं चलता हूं उसकी आहट मिलती है
रग रग मेरे रोम रोम में ऐसे ही वह समाई है
कि सारी दुनिया मिलकर ढूंढे फिर भी ढूंढ न पाई है
कायरता है................।।
मेरा शांत चित्त वह चंचल विह्वल अब डूब रहा मैं उसमें पल पल
कभी आशा की इक ज्योति है खिलती कभी कभी बुझ जाती है
है दौर उलझनों का ऐसा
कह रहा हो मानो वो वैसा
अंतर्द्वंदों की बैसाखी में मैं डूब रहा हूं मानो ऐसा
आसान नहीं यह डगर प्रेम की मुश्किल जीना कर देती है
डाल आदतें तू कांटो की भी
बस फूलों की ही चाह ना रख
है योद्धा तू भी इस रण का अब विजयश्री संघ हार का भी स्वाद तू चख
हे वीर धीर गंभीर पुरुष
निष्काम निस्वार्थ निष्पाप कर तैयार तुरूप
हो आशावादी, दृढ निश्चयी
आसान नहीं ये रण
गर होता है विचलित तो
ये जीवन में उथल पुथल कर देती है
रख धैर्य बढ़ा है जो इसमें
असीम सफलता पायी है
स्वच्छन्द रूप से आने दे उसको
जागीर नहीं है वो तेरी
उसकी अपनी भी परछाई है
कायरता है.........।।
या प्रेम विवशता छायी है
कहना चाहा कह न पाया
वो सामने जब जब आयी है।।
दिन रात उसी की आहें भरता
दिल पल पल उसकी याद में मरता
सुध खोकर बेसुध सा पडा़ हूँ
छोड़ उसे सारी दुनिया,
कितनी हो गयी परायी है
कायरता है...............।।
बेचैनी है दिल में आंखों में कल के सपने हैं
आजाद परिंदे सा उड़ जाते जंजीरों मे जकडे़ हैं
अब तक जिनसे पहचान न हो सकी
हर सपने में वो ही बस अपने हैं।
सोच रहा हूँ अब कह ही दूं तुमको
तुम बिन जीना दुनियाँ में ,
अब लगती एक बुराई है
कायरता है.......।।
झंझावातों तूफानों को कब कब कितना झेलें हैं,
हुआ नहीं एहसास धरा पर कितने हम अकेले हैं,
मायूसी का ऐसा मंजर, पहले कभी न छाया था,
दर्द गमों को हम क्या जाने न रिश्ते कभी निभाया था
आज मगर अन्धेरों में भी उसकी सूरत दिखती है
कौन कहेगा मैं चलता हूं उसकी आहट मिलती है
रग रग मेरे रोम रोम में ऐसे ही वह समाई है
कि सारी दुनिया मिलकर ढूंढे फिर भी ढूंढ न पाई है
कायरता है................।।
मेरा शांत चित्त वह चंचल विह्वल अब डूब रहा मैं उसमें पल पल
कभी आशा की इक ज्योति है खिलती कभी कभी बुझ जाती है
है दौर उलझनों का ऐसा
कह रहा हो मानो वो वैसा
अंतर्द्वंदों की बैसाखी में मैं डूब रहा हूं मानो ऐसा
आसान नहीं यह डगर प्रेम की मुश्किल जीना कर देती है
डाल आदतें तू कांटो की भी
बस फूलों की ही चाह ना रख
है योद्धा तू भी इस रण का अब विजयश्री संघ हार का भी स्वाद तू चख
हे वीर धीर गंभीर पुरुष
निष्काम निस्वार्थ निष्पाप कर तैयार तुरूप
हो आशावादी, दृढ निश्चयी
आसान नहीं ये रण
गर होता है विचलित तो
ये जीवन में उथल पुथल कर देती है
रख धैर्य बढ़ा है जो इसमें
असीम सफलता पायी है
स्वच्छन्द रूप से आने दे उसको
जागीर नहीं है वो तेरी
उसकी अपनी भी परछाई है
कायरता है.........।।

5 टिप्पणियां:
Fantastic mindbolwing superr😁😁
Thanks
Ekdum situation k Hisaab se likhte hain
Umda 👌👍
Arvind bhaiya dil ki awaj thi bas juban pe aa gyi😀
This is really adorable and expressing the tyro of love.
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