प्यार, मैं और वो..


श़राफत  के चोले में लिपटी है वो ऐसे,
शहद छत्तों में मधुमक्खियों से ढंका हो जैसे।
मेरे पास ऐसा धूआं नहीं है फैला दूं उस पर,
गिर जाये मेरे झोली में गिरता है शहद जैसे।।
मधुमक्खियों से डर नहीं जितना कि शहद से,
डूब जाती हैं तो जान चली जाती है कैसे।।
डर है कहीं पागल न हो जाऊँ उसकी अति से,
घूमने लगूँ न गली गली भिखारियों के जैसे।।
कनक की लत बुरी नहीं होती कितना भी क्यों न हो,
पर कोई खा ले तो पागल हो जाता है जैसे।।
सितारे, चांद कह कर तारीफ करना बेवकूफी लगती है अब,
जब से जान गया हूँ ये खुद बनें हैं कैसे।।
इन्सान है वो निर्जीवों संग तुलना करना नाइंसाफी लगती है अब,
पहचान लेने दो खुद क्या है कौन है कैसे।।
कुछ तो संजीदा कह दो अब प्यार को भी
फूलों संग भौरों के रिश्ते हैं कैसे।।
अकेले अकेले कब तक चलोगे सफर लम्बा है
क्यों न चल कर देखें रेल की पटरियों के जैसे।।
थक जाओगे आ जाओ मेरा सहारा बड़ा चंगा है
चैन से सो पाओगे माँ की गोंद के जैसे।।
काट खाने को बैठे है हर मंजिल पर खूनी दरिंदे
आसान नहीं मानो ये सांप सीढ़ी का खेल हो जैसे।।

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