इन्तज़ार






मोहब्बत के चन्द लफ्जों की तलाश में
भटक रहा हूँ मैं आसमां की आश में
शायद कोई कशक अभी भी बाकी है
जो फिर से उलझ रहा हूँ उन्हीं पुराने जज्बात में।।
एक वो शहर था अनजान सा
एक ये शहर है अन्जाम का
दोस्त तो बहुत आ गये दोस्ती के म्यान में
पर एक खालीपन अभी भी है दिल के दरमियाँ में।।
न आगाज का पता है, न अंजाम की खबर
डूबकर उसमें हो गया हूँ दुनिया से बेखबर
लोग कहने लगे हैं कि आशिकी में चूर हूँ
क्या बताऊँ यारों मै खुद से मजबूर हूँ
इश्क़ में उसके ढलता डूबता हूँ ऐसे
जैसे सूरज का हाल है आसमां में
पर बेफिक्र वो ऐसे नजरंदाज कर रही है
जैसे जमीं पर कोई परी उतर आई हो इस गुमान में।।
कभी हाल ही पूछ लिया करो इस हाल में
क्या हाल है हमारा तुम्हारी तलाश में
हो सकता है तुम्हे न फर्क़ पड़ता हो इस बात का
पर कभी तो ख्याल कर लिया करो मेरे जज्बात का
यूँ भी तो नहीं है कि तुम्हे कुछ पता नहीं
भावनाओं को समझो भूल जाओ क्या गलत क्या सही
याद है तुमने ही कहा था कुछ भी हो तो मुझसे कहना
प्यार हो गया है तुमसे बताओ मुझे कैसे है रहना
क्या कहूं मैं खो गया हूँ कहीं तुम्हारे अन्जुमन में
अच्छा लगता है डूबे रहना तेरी इब्तिसाम में।।
कब तक आखिर कब तक यूँ कुछ न बोलोगी
यकीं है मुझे तुम कभी न कभी तो बोलोगी
माना कि तुम रूठे रहने की पूरी कोशिश करोगी
पर मुझे भी यकीं है सच न ही सही पर झूठ तुम जरूर बोलोगी।
चलो भी अब झूठ और सच का फैसला बाद में कराओ
आओ पहले तुम कुछ बोल के दिखाओ।
तुम्हारे सिर्फ बोलने से मेरे पैर पडेंगे आसमान में
जो अब नहीं बोली तो इन्तजार करेंगे श्मशान में।।


कोई टिप्पणी नहीं: